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 February 10, 2020 

कृष्ण सहस्त्रनाम् पाठ

इस कृष्ण सहस्त्रनाम् का रोज नियमित रूप से एक बार पाठ करने से आकर्षण शक्ति के साथ सभी प्रकार की मनोकामना पूर्ण होती है.


कृष्णश्श्रीवल्लभश्शांर्गी विष्वक्सेनस्स्वसिद्धिदः।
क्षीरोदधामा व्यूहेशश्शेषशायी जगन्मयः॥1॥
भक्तिगम्यस्रीमूर्तिर्भा-रार्तवसुधास्तुतः।
देवदेवो दयासिन्धुर्देवदेवशिखामणिः॥2॥
सुखभावस्सुखाधारोमुकुन्दो मुदिताशयः।
अविक्रियः क्रियामूर्तिरध्यात्मस्वस्वरूपवान्‌॥3॥
शिष्टाभिलक्ष्यो भूतात्मा धर्मत्राणार्थचेष्टितः।
अन्तर्यामी कलारूपः कालावयवसाक्षिकः॥4॥
वसुधायासहरणो नारदप्रेरणोन्मुखः।
प्रभूष्णुर्नारदोद्गीतो लोकरक्षापरायणः॥5॥
रौहिणेयकृतानन्दो योगज्ञाननियोजकः।
महागुहान्तर्निक्षिप्तः पुराण व पुरात्मवान्‌॥6॥
शूरवंशैकधीश्शौरिः कंसशंकाविषादकृत्‌।
वसुदेवोल्लसच्छक्ति-र्देवक्यष्टमगर्भगः॥7॥
वसुदेवसुतश्श्रीमान्देवकीनन्दनो हरिः।
आश्चर्यबालश्श्रीवत्स-लक्ष्मवक्षाश्चतुर्भुजः॥8॥
स्वभावोत्कृष्टसद्भावः कृष्णाष्टम्यन्तसम्भवः।
प्राजापत्यर्क्षसम्भूतो निशीथसमयोदितः॥9॥
शंखचक्रगदापद्मपाणिः पद्मनिभेक्षणः।
किरीटी कौस्तुभोरस्कः स्फुरन्मकरकुण्डलः॥10॥
पीतवासा घनश्यामः कुंचितांचितकुन्तलः।
सुव्यक्तव्यक्ताभरणः सूतिकागृहभूषणः॥11॥
कारागारान्धकारघ्नः पितृप्राग्जन्मसूचकः।
वसुदेवस्तुतः स्तोत्रं तापत्रयनिवारणः॥12॥
निरवद्यः क्रियामूर्तिर्न्यायवाक्यनियोजकः।
अदृष्टचेष्टः कूटस्थो धृतलौकिकविग्रहः॥13॥
महर्षिमानसोल्लासो महीमंगलदायकः।
सन्तोषितसुरव्रातः साधुुचित्तप्रसादकः॥14॥
जनकोपायनिर्देष्टा देवकीनयनोत्सवः।
पितृपाणिपरिष्कारो मोहितागाररक्षकः॥15॥
स्वशक्तयुद्धाटिताशेषकपाटः पितृवाहकः।
शेषोरगफणाच्छत्रश्शेषोक्ताख्यासहस्रकः॥16॥
यमुनापूरविध्वंसी स्वभासोद्भासितव्रजः।
कृतात्मविद्याविन्यासो योगमायाग्रसम्भवः॥17॥
दुर्गानिवेदितोद्भावो यशोदातल्पशायकः।
नन्दगोपोत्सवस्फूर्तिर्व्रजानन्दकरोदयः॥18॥
सुजातजातकर्म श्रीर्गोपीभद्रोक्तिनिर्वतः।
अलीकनिद्रोपगमः पूतनास्तनपीडनः॥19॥
स्तन्यात्तपूतनाप्राणः पूतनाक्रोशकारकः।
विन्यस्तरक्षा गोधूलिर्यशोदाकरलालितः॥20॥
नन्दाघ्रातशिरोमध्यः पूतनासुगतिप्रदः।
बालः पर्यंकनिद्रालुर्मुखार्पितपदांगुलिः॥21॥
अंजनस्निग्धनयनः पर्यायांकुरितस्मितः।
लीलाक्षस्तरलालोकश्शटासुर भंजनः॥22॥
द्विजोदितस्वस्त्ययनो मंत्रपूतजलाप्लुतः।
यशोदोत्संगपर्यंको यशोदामुखवीक्षकः॥23॥
यशोदास्तन्यमुदितस्तृणावर्तादिदुस्सहः।
तृणावर्तासुरध्वंसी मातृविस्मयकारकः॥24॥
प्रशस्तनामकरणो जानुचंक्रमणोत्सुकः।
व्यालम्बिचूलिकारत्नो घोषगोपप्रहर्षणः॥25॥
स्वमुखप्रतिबिम्बार्थी ग्रीवाव्याघ्रनखोज्जुलः।
पंकानुलेपरुचिरो मांसलोरुकटीतटः॥26॥
घृष्टजानुकरद्वंद्वः प्रतिबिम्बानुकारकृत्‌।
अव्यक्तवर्णवाग्वृत्तिः स्मितलक्ष्यरदोद्नमः॥27॥
धात्रीकरसमालम्बी प्रस्खलचित्रचंक्रमः।
अनुरूपवयस्याढ्यश्चारुकौमारचापलः॥28॥
वत्सपुच्छसमाकृष्टो वत्सपुच्छविकर्षणः।
विस्मारितान्यव्यापारो गोपीगोपीमुदावहः॥29॥
अकालवत्सनिर्मोक्ता व्रजव्याक्रोशसुस्मितः।
नवनीतमहाचोरो दारकाहारदायकः॥30॥
पीठोलूखलसोपानः क्षीरभाण्डविभेदनः।
शिक्य माण्डसमकर्षी ध्वान्तागारप्रवेशकृत॥31॥
भूषारत्नप्रकाशाढ्यो गोप्युपालम्भभर्त्सितः।
परागधूसराकारो मृद्भक्षणकृतेक्षणः॥32॥
बालोक्तमृत्कथारम्भो मित्रान्तर्गूढविग्रहः।
कृतसन्त्रासलोलाक्षो जननीप्रत्ययावहः॥33।
मातृदृश्यात्तवदनो वक्रलक्ष्यचराचरः।
यशोदाललितस्वात्मा स्वयं स्वाच्छन्द्यमोहनः॥34॥
सवित्रीस्नेहसंश्लिष्टः सवित्रीस्तनलोलुपः।
नवनीतार्थनाप्रह्वो नवनीतमहाशनः॥35॥
मृषाकोप्रकम्पोष्ठो गोष्ठांगणविलोकनः।
दधिमन्थघटीभेत्ता किकिंणीक्काणसूचितः॥36॥
हैयंगवीनरसिको मृषाश्रुश्चौर्यशंकितः।
जननीश्रमविज्ञाता दामबन्धनियंत्रितः॥37॥
दामाकल्पश्चलापांगो गाढोलूखलबन्धनः।
आकृष्टोलूखनोऽनन्तः कुबेरसुतशापिवत्‌॥। 38॥
नारदोक्तिपरामर्शी यमलार्जुनभंजनः।
धनदात्मजसंघुष्टो नन्दमोचितबन्धनः॥39॥
बालकोद्गीतनिरतो बाहुक्षेपोदितप्रियः।
आत्मज्ञो मित्रवशगो गोपीगीतगुणोदयः॥40॥
प्रस्थानशकटारूढो वृन्दावनकृतालयः।
गोवत्सपालनैकाग्रो नानाक्रीडापरिच्छदः॥41॥
क्षेपणीक्षेपणप्रीतो वेणुवाद्यविशारदः।
वृषवत्सानुकरणो वृषध्वानिविडम्बनः॥42॥
नियुद्धलीलासंहृष्टः कूजानुकृतकोकिलः।
उपात्तहं सगमनस्सर्वजन्तुरुतानुकृत्‌॥43॥
भृंगानुकारी दध्यन्नचोरो वत्सपुरस्सरः।
बली बकासुरग्राही बकतालुप्रदाहकः॥44॥
भीतगोपार्भकाहूतो बकचंचुविदारणः।
बकासुरारिर्गोपालो बालो बालाद्भुतावहः॥45॥
बलभद्रसमाश्लिष्टः कृतक्रीडानिलायनः।
क्रीडासेतुनिधानज्ञः प्लवंगोत्प्लवनोऽद्भुतः॥46॥
कन्दुकक्रीडनो लुप्तनन्दादिभववेदनः।
सुमनोऽलंकृतशिराः स्वादुस्निग्धान्नशिक्यभृत्‌॥47॥
गुंजाप्रालम्बनच्छन्नः पिंछैरलकवेषकृत्‌।
वन्याशनप्रियश्श्रृंगरवाकारितवत्सकः॥48॥
मनोज्ञपल्लवोत्तं स्वपुष्पस्वेच्छात्तषट्पदः।
मंजुशिंजितमंजीरचरणः करकंकणः॥49॥
अन्योन्यशासनः कीड़ापटुः परमकैतवः।
प्रतिध्वानप्रमुदितः शाखाचतुरचंक्रमः॥50॥
अघदानवसंहर्ता त्रजविघ्नविनाशनः।
व्रजसंजीवनश्श्रेयोनिधिर्दानवमुक्तिदः॥51॥

 February 23, 2019 

भैरव चालीसा पाठ

इस पाठ को नियमित करने से हर तरह की सुरक्षा के साथ देवी कृपा भी प्राप्त होती है. हर तरह का भै नष्ट होने के साथ भौतिक सुख की प्राप्ति होती है.

॥ दोहा ॥

श्री गणपति, गुरु गौरि पद, प्रेम सहित धरि माथ ।
चालीसा वन्दन करों, श्री शिव भैरवनाथ ॥

श्री भैरव संकट हरण, मंगल करण कृपाल ।
श्याम वरण विकराल वपु, लोचन लाल विशाल ॥

|| चौपाई ||

जय जय श्री काली के लाला । जयति जयति काशी-कुतवाला ॥

जयति बटुक भैरव जय हारी । जयति काल भैरव बलकारी ॥

जयति सर्व भैरव विख्याता । जयति नाथ भैरव सुखदाता ॥

भैरव रुप कियो शिव धारण । भव के भार उतारण कारण ॥

भैरव रव सुन है भय दूरी । सब विधि होय कामना पूरी ॥

शेष महेश आदि गुण गायो । काशी-कोतवाल कहलायो ॥

जटाजूट सिर चन्द्र विराजत । बाला, मुकुट, बिजायठ साजत ॥

कटि करधनी घुंघरु बाजत । दर्शन करत सकल भय भाजत ॥

जीवन दान दास को दीन्हो । कीन्हो कृपा नाथ तब चीन्हो ॥

वसि रसना बनि सारद-काली । दीन्यो वर राख्यो मम लाली ॥

धन्य धन्य भैरव भय भंजन । जय मनरंजन खल दल भंजन ॥

कर त्रिशूल डमरु शुचि कोड़ा । कृपा कटाक्ष सुयश नहिं थोड़ा ॥

जो भैरव निर्भय गुण गावत । अष्टसिद्घि नवनिधि फल पावत ॥

रुप विशाल कठिन दुख मोचन । क्रोध कराल लाल दुहुं लोचन ॥

अगणित भूत प्रेत संग डोलत । बं बं बं शिव बं बं बोतल ॥

रुद्रकाय काली के लाला । महा कालहू के हो काला ॥

बटुक नाथ हो काल गंभीरा । श्वेत, रक्त अरु श्याम शरीरा ॥

करत तीनहू रुप प्रकाशा । भरत सुभक्तन कहं शुभ आशा ॥

त्न जड़ित कंचन सिंहासन । व्याघ्र चर्म शुचि नर्म सुआनन ॥

तुमहि जाई काशिहिं जन ध्यावहिं । विश्वनाथ कहं दर्शन पावहिं ॥

जय प्रभु संहारक सुनन्द जय । जय उन्नत हर उमानन्द जय ॥

भीम त्रिलोकन स्वान साथ जय । बैजनाथ श्री जगतनाथ जय ॥

महाभीम भीषण शरीर जय । रुद्र त्र्यम्बक धीर वीर जय ॥

अश्वनाथ जय प्रेतनाथ जय । श्वानारुढ़ सयचन्द्र नाथ जय ॥

निमिष दिगम्बर चक्रनाथ जय । गहत अनाथन नाथ हाथ जय ॥

त्रेशलेश भूतेश चन्द्र जय । क्रोध वत्स अमरेश नन्द जय ॥

श्री वामन नकुलेश चण्ड जय । कृत्याऊ कीरति प्रचण्ड जय ॥

रुद्र बटुक क्रोधेश काल धर । चक्र तुण्ड दश पाणिव्याल धर ॥

करि मद पान शम्भु गुणगावत । चौंसठ योगिन संग नचावत ।

करत कृपा जन पर बहु ढंगा । काशी कोतवाल अड़बंगा ॥

देयं काल भैरव जब सोटा । नसै पाप मोटा से मोटा ॥

जाकर निर्मल होय शरीरा। मिटै सकल संकट भव पीरा ॥

श्री भैरव भूतों के राजा । बाधा हरत करत शुभ काजा ॥

ऐलादी के दुःख निवारयो । सदा कृपा करि काज सम्हारयो ॥

सुन्दरदास सहित अनुरागा । श्री दुर्वासा निकट प्रयागा ॥

श्री भैरव जी की जय लेख्यो । सकल कामना पूरण देख्यो ॥

॥ दोहा ॥

जय जय जय भैरव बटुक, स्वामी संकट टार ।
कृपा दास पर कीजिये, शंकर के अवतार ॥

जो यह चालीसा पढ़े, प्रेम सहित सत बार ।
उस घर सर्वानन्द हों, वैभव बड़े अपार ॥

|| इति श्री भैरव चालीसा समाप्त ||

 February 23, 2019 

श्री कृष्ण चालीसा

॥दोहा॥

बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम।
अरुण अधर जनु बिम्बफल, नयन कमल अभिराम॥
पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख, पीताम्बर शुभ साज।
जय मनमोहन मदन छवि, कृष्णचन्द्र महाराज॥

जय यदुनंदन जय जगवंदन।जय वसुदेव देवकी नन्दन॥
जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥
जय नटनागर, नाग नथइया॥ कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया॥
पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥
वंशी मधुर अधर धरि टेरौ। होवे पूर्ण विनय यह मेरौ॥
आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥
गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥
राजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजन्तीमाला॥

कुंडल श्रवण, पीत पट आछे। कटि किंकिणी काछनी काछे॥
नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥
मस्तक तिलक, अलक घुँघराले। आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥
करि पय पान, पूतनहि तार्यो। अका बका कागासुर मार्यो॥

मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला। भै शीतल लखतहिं नंदलाला॥
सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई। मूसर धार वारि वर्षाई॥
लगत लगत व्रज चहन बहायो। गोवर्धन नख धारि बचायो॥
लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥

दुष्ट कंस अति उधम मचायो॥ कोटि कमल जब फूल मंगायो॥
नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥
करि गोपिन संग रास विलासा। सबकी पूरण करी अभिलाषा॥
केतिक महा असुर संहार्यो। कंसहि केस पकड़ि दै मार्यो॥

मातपिता की बन्दि छुड़ाई ।उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥
महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥
भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दश सहसकुमारी॥
दै भीमहिं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहँ मारा॥

असुर बकासुर आदिक मार्यो। भक्तन के तब कष्ट निवार्यो॥
दीन सुदामा के दुःख टार्यो। तंदुल तीन मूंठ मुख डार्यो॥
प्रेम के साग विदुर घर माँगे।दर्योधन के मेवा त्यागे॥
लखी प्रेम की महिमा भारी।ऐसे श्याम दीन हितकारी॥

भारत के पारथ रथ हाँके।लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥
निज गीता के ज्ञान सुनाए।भक्तन हृदय सुधा वर्षाए॥
मीरा थी ऐसी मतवाली।विष पी गई बजाकर ताली॥
राना भेजा साँप पिटारी।शालीग्राम बने बनवारी॥

निज माया तुम विधिहिं दिखायो।उर ते संशय सकल मिटायो॥
तब शत निन्दा करि तत्काला।जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥
जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।दीनानाथ लाज अब जाई॥
तुरतहि वसन बने नंदलाला।बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥

अस अनाथ के नाथ कन्हइया। डूबत भंवर बचावइ नइया॥
सुन्दरदास आ उर धारी।दया दृष्टि कीजै बनवारी॥
नाथ सकल मम कुमति निवारो।क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥
खोलो पट अब दर्शन दीजै।बोलो कृष्ण कन्हइया की जै॥

॥दोहा॥

यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।
अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥

 February 23, 2019 

सरस्वती चालीसा

सरस्वती चालीसा का नियमित पाठ करने से कला, योग्यता तथा वाणी मे निखार आता है. और माता लक्ष्मी की कृपा अपने आप मिलनी शुरु हो जाती है.

दोहा :

जनक जननि पद्मरज, निज मस्तक पर धरि।
बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥
पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु।
दुष्जनों के पाप को, मातु तु ही अब हन्तु॥
जय श्री सकल बुद्धि बलरासी, जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी॥
जय जय जय वीणाकर धारी, करती सदा सुहंस सवारी॥
रूप चतुर्भुज धारी माता, सकल विश्व अन्दर विख्याता॥
जग में पाप बुद्धि जब होती, तब ही धर्म की फीकी ज्योति॥
तब ही मातु का निज अवतारी, पाप हीन करती महतारी॥
वाल्मीकिजी थे हत्यारा,तव प्रसाद जानै संसारा॥
रामचरित जो रचे बनाई, आदि कवि की पदवी पाई॥
कालिदास जो भये विख्याता,तेरी कृपा दृष्टि से माता॥
तुलसी सूर आदि विद्वाना, भये और जो ज्ञानी नाना॥
तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा, केव कृपा आपकी अम्बा॥
करहु कृपा सोइ मातु भवानी, दुखित दीन निज दासहि जानी॥
पुत्र करहिं अपराध बहूता, तेहि न धरई चित माता॥
राखु लाज जननि अब मेरी, विनय करउं भांति बहु तेरी॥
मैं अनाथ तेरी अवलंबा, कृपा करउ जय जय जगदंबा॥
मधुकैटभ जो अति बलवाना, बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना॥
समर हजार पाँच में घोरा, फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा॥
मातु सहाय कीन्ह तेहि काला,बुद्धि विपरीत भई खलहाला॥
तेहि ते मृत्यु भई खल केरी, पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥
चंड मुण्ड जो थे विख्याता, क्षण महु संहारे उन माता॥
रक्त बीज से समरथ पापी, सुरमुनि हदय धरा सब काँपी॥
काटेउ सिर जिमि कदली खम्बा,बारबार बिन वउं जगदंबा॥
जगप्रसिद्ध जो शुंभनिशुंभा,क्षण में बाँधे ताहि तू अम्बा॥
भरतमातु बुद्धि फेरेऊ जाई,रामचन्द्र बनवास कराई॥
एहिविधि रावण वध तू कीन्हा, सुर नरमुनि सबको सुख दीन्हा॥
को समरथ तव यश गुन गाना,निगम अनादि अनंत बखाना॥
विष्णु रुद्र जस कहिन मारी,जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥
रक्त दन्तिका और शताक्षी,नाम अपार है दानव भक्षी॥
दुर्गम काज धरा पर कीन्हा, दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥
दुर्ग आदि हरनी तू माता ,कृपा करहु जब जब सुखदाता॥
नृप कोपित को मारन चाहे, कानन में घेरे मृग नाहे॥
सागर मध्य पोत के भंजे, अति तूफान नहिं कोऊ संगे॥
भूत प्रेत बाधा या दुःख में,हो दरिद्र अथवा संकट में॥
नाम जपे मंगल सब होई,संशय इसमें करई न कोई॥
पुत्रहीन जो आतुर भाई, सबै छांड़ि पूजें एहि भाई॥
करै पाठ नित यह चालीसा,होय पुत्र सुन्दर गुण ईशा॥
धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै,संकट रहित अवश्य हो जावै॥
भक्ति मातु की करैं हमेशा, निकट न आवै ताहि कलेशा॥
बंदी पाठ करें सत बारा,बंदी पाश दूर हो सारा॥
रामसागर बाँधि हेतु भवानी,कीजै कृपा दास निज जानी॥
दोहा : मातु सूर्य कान्ति तव, अन्धकार मम रूप।
डूबन से रक्षा करहु परूँ न मैं भव कूप॥
बलबुद्धि विद्या देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु।
राम सागर अधम को आश्रय तू ही देदातु॥

 February 22, 2019 

शिव चालीसा पाठ

शिव चालीसा के माध्यम से आप अपने सारे दुखों को, विघ्नो को, समस्याओ को नष्ट कर भगवान शिव की अपार कृपा प्राप्त कर सकते हैं. नियमित शिव चालीसा का पाठ करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाये पूर्ण हो जाती है.


।।दोहा।।

श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।

कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥

भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥

अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥

मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥

किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥

आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥

किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥

दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥

वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥

कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥

पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥

सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥

मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥

धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥

अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥

नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥

जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥

ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥

पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥

त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥

जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥

कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥


॥दोहा॥


नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।


तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥


मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।


अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

 February 21, 2019 

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श्री गणेश चालीसा पाठ

भगवान  श्री गणेश मंगलकार व कार्य सिद्धी के देवता हैं. किसी भी पूजा अनुष्ठान- साधना में सबसे पहले गणपति का आवाहृन करना जरूरी होता है, नहीं तो पूजा-साधना अधूरी मानी जाती है. इस गणेश चालीसा पाठ को को किसी भी बुधवार या चतुर्थी के दिन से शुरु कर सकते है. ..

दोहा
जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

चौपाई
जय जय जय गणपति गणराजू।
मंगल भरण करण शुभ काजू॥1॥

जय गजबदन सदन सुखदाता।
विश्व विनायक बुद्घि विधाता॥2॥

वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन।
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥3॥

राजत मणि मुक्तन उर माला।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥4॥

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।
मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥5॥

सुन्दर पीताम्बर तन साजित।
चरण पादुका मुनि मन राजित॥6॥

धनि शिवसुवन षडानन भ्राता।
गौरी ललन विश्व-विख्याता॥7॥

ऋद्घि-सिद्घि तव चंवर सुधारे।
मूषक वाहन सोहत द्घारे॥8॥

कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी।
अति शुचि पावन मंगलकारी॥9॥

एक समय गिरिराज कुमारी।
पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी॥10॥

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा।
तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा॥11॥

अतिथि जानि कै गौरि सुखारी।
बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥12॥

अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥13॥

मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला।
बिना गर्भ धारण, यहि काला॥14॥

गणनायक, गुण ज्ञान निधाना।
पूजित प्रथम, रुप भगवाना॥15॥

अस कहि अन्तर्धान रुप है।
पलना पर बालक स्वरुप है॥16॥

बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना।
लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥17॥

सकल मगन, सुखमंगल गावहिं।
नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥18॥

शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं।
सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥19॥

लखि अति आनन्द मंगल साजा।
देखन भी आये शनि राजा॥20॥

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं।
बालक, देखन चाहत नाहीं॥21॥

गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो।
उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो॥22॥

कहन लगे शनि, मन सकुचाई।
का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥23॥

नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ।
शनि सों बालक देखन कहाऊ॥24॥

पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा।
बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा॥25॥

गिरिजा गिरीं विकल हुए धरणी।
सो दुख दशा गयो नहीं वरणी॥26॥

हाहाकार मच्यो कैलाशा।
शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा॥27॥

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो।
काटि चक्र सो गज शिर लाये॥28॥

बालक के धड़ ऊपर धारयो।
प्राण, मंत्र पढ़ि शंकर डारयो॥29॥

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे।
प्रथम पूज्य बुद्घि निधि, वन दीन्हे॥30॥

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा।
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥31॥

चले षडानन, भरमि भुलाई।
रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई॥32॥

धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे।
नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥33॥

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें।
तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥34॥

तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई।
शेष सहसमुख सके न गाई॥35॥

मैं मतिहीन मलीन दुखारी।
करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥36॥

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा।
जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥37॥

अब प्रभु दया दीन पर कीजै।
अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥38॥

श्री गणेश यह चालीसा।
पाठ करै कर ध्यान॥39॥

नित नव मंगल गृह बसै।
लहे जगत सन्मान॥40॥

दोहा
सम्वत अपन सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥