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 February 16, 2020 

श्री गायत्री चालीसा

इस चालीसा का नियमित ३ पाठ करने वाला उपासक यहा सुख समृद्धि हमेशा बनी रहती है.

॥ दोहा ॥

ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा,जीवन ज्योति प्रचण्ड।

शान्ति कान्ति जागृत प्रगति,रचना शक्ति अखण्ड॥

जगत जननी मङ्गल करनि,गायत्री सुखधाम।

प्रणवों सावित्री स्वधा,स्वाहा पूरन काम॥

॥ चौपाई ॥

भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी।गायत्री नित कलिमल दहनी॥

अक्षर चौविस परम पुनीता।इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता॥

शाश्वत सतोगुणी सत रूपा।सत्य सनातन सुधा अनूपा॥

हंसारूढ सिताम्बर धारी।स्वर्ण कान्ति शुचि गगन-बिहारी॥

पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला।शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला॥

ध्यान धरत पुलकित हित होई।सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई॥

कामधेनु तुम सुर तरु छाया।निराकार की अद्भुत माया॥

तुम्हरी शरण गहै जो कोई।तरै सकल संकट सों सोई॥

सरस्वती लक्ष्मी तुम काली।दिपै तुम्हारी ज्योति निराली॥

तुम्हरी महिमा पार न पावैं।जो शारद शत मुख गुन गावैं॥

चार वेद की मात पुनीता।तुम ब्रह्माणी गौरी सीता॥

महामन्त्र जितने जग माहीं।कोउ गायत्री सम नाहीं॥

सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै।आलस पाप अविद्या नासै॥

सृष्टि बीज जग जननि भवानी।कालरात्रि वरदा कल्याणी॥

ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते।तुम सों पावें सुरता तेते॥

तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे।जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥

महिमा अपरम्पार तुम्हारी।जय जय जय त्रिपदा भयहारी॥

पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना।तुम सम अधिक न जगमे आना॥

तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा।तुमहिं पाय कछु रहै न कलेशा॥

जानत तुमहिं तुमहिं व्है जाई।पारस परसि कुधातु सुहाई॥

तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई।माता तुम सब ठौर समाई॥

ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे।सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥

सकल सृष्टि की प्राण विधाता।पालक पोषक नाशक त्राता॥

मातेश्वरी दया व्रत धारी।तुम सन तरे पातकी भारी॥

जापर कृपा तुम्हारी होई।तापर कृपा करें सब कोई॥

मन्द बुद्धि ते बुधि बल पावें।रोगी रोग रहित हो जावें॥

दरिद्र मिटै कटै सब पीरा।नाशै दुःख हरै भव भीरा॥

गृह क्लेश चित चिन्ता भारी।नासै गायत्री भय हारी॥

सन्तति हीन सुसन्तति पावें।सुख संपति युत मोद मनावें॥

भूत पिशाच सबै भय खावें।यम के दूत निकट नहिं आवें॥

जो सधवा सुमिरें चित लाई।अछत सुहाग सदा सुखदाई॥

घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी।विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥

जयति जयति जगदम्ब भवानी।तुम सम ओर दयालु न दानी॥

जो सतगुरु सो दीक्षा पावे।सो साधन को सफल बनावे॥

सुमिरन करे सुरूचि बडभागी।लहै मनोरथ गृही विरागी॥

अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता।सब समर्थ गायत्री माता॥

ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी।आरत अर्थी चिन्तित भोगी॥

जो जो शरण तुम्हारी आवें।सो सो मन वांछित फल पावें॥

बल बुधि विद्या शील स्वभाउ।धन वैभव यश तेज उछाउ॥

सकल बढें उपजें सुख नाना।जे यह पाठ करै धरि ध्याना॥

॥ दोहा ॥

यह चालीसा भक्ति युत,पाठ करै जो कोई।

तापर कृपा प्रसन्नता,गायत्री की होय॥

 February 21, 2019 

शनि चालीसा पाठ

आज इस कलियुग मे हर मनुष्य को शनि चालीसा का पाठ करना चाहिये ये पाठ दुर्भाग्य को सौभाग्य मे बदलता है. पाप कर्म को नष्ट करता है. असुरक्षा की भावना को दूर करता है. समस्याओ मे लडने की क्षमता को बढाता है. किसी भी शनिवार से ११ से २१ शनि चालीसा का पाठ अवश्य करे..

 

श्री शनि चालीसा
दोहा

जय-जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महराज।
करहुं कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज।।
चौपाई
जयति-जयति शनिदेव दयाला।
    करत सदा भक्तन प्रतिपाला।।
चारि भुजा तन श्याम विराजै।
    माथे रतन मुकुट छवि छाजै।।
परम विशाल मनोहर भाला।
    टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला।।
कुण्डल श्रवण चमाचम चमकै।
    हिये माल मुक्तन मणि दमकै।।
कर में गदा त्रिशूल कुठारा।
    पल विच करैं अरिहिं संहारा।।
पिंगल कृष्णो छाया नन्दन।
    यम कोणस्थ रौद्र दुःख भंजन।।
सौरि मन्द शनी दश नामा।
    भानु पुत्रा पूजहिं सब कामा।।
जापर प्रभु प्रसन्न हों जाहीं।
    रंकहु राउ करें क्षण माहीं।।
पर्वतहूं तृण होई निहारत।
    तृणहंू को पर्वत करि डारत।।
राज मिलत बन रामहि दीन्हा।
    कैकइहूं की मति हरि लीन्हा।।
बनहूं में मृग कपट दिखाई।
    मात जानकी गई चुराई।।
लषणहि शक्ति बिकल करि डारा।
    मचि गयो दल में हाहाकारा।।
दियो कीट करि कंचन लंका।
    बजि बजरंग वीर को डंका।।
नृप विक्रम पर जब पगु धारा।
    चित्रा मयूर निगलि गै हारा।।
हार नौलखा लाग्यो चोरी।
    हाथ पैर डरवायो तोरी।।
भारी दशा निकृष्ट दिखाओ।
    तेलिहुं घर कोल्हू चलवायौ।।
विनय राग दीपक महं कीन्हो।
    तब प्रसन्न प्रभु ह्नै सुख दीन्हों।।
हरिशचन्द्रहुं नृप नारि बिकानी।
    आपहुं भरे डोम घर पानी।।
वैसे नल पर दशा सिरानी।
    भूंजी मीन कूद गई पानी।।
श्री शकंरहि गहो जब जाई।
    पारवती को सती कराई।।
तनि बिलोकत ही करि रीसा।
    नभ उड़ि गयो गौरि सुत सीसा।।
पाण्डव पर ह्नै दशा तुम्हारी।
    बची द्रोपदी होति उघारी।।
कौरव की भी गति मति मारी।
    युद्ध महाभारत करि डारी।।
रवि कहं मुख महं धरि तत्काला।
    लेकर कूदि पर्यो पाताला।।
शेष देव लखि विनती लाई।
    रवि को मुख ते दियो छुड़ाई।।
वाहन प्रभु के सात सुजाना।
    गज दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना।।
जम्बुक सिंह आदि नख धारी।
    सो फल ज्योतिष कहत पुकारी।।
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं।
    हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं।।
गर्दभहानि करै बहु काजा।
    सिंह सिद्धकर राज समाजा।।
जम्बुक बुद्धि नष्ट करि डारै।
    मृग दे कष्ट प्राण संहारै।।
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी।
    चोरी आदि होय डर भारी।।
तैसहिं चारि चरण यह नामा।
    स्वर्ण लोह चांदी अरु ताम्बा।।
लोह चरण पर जब प्रभु आवैं।
    धन सम्पत्ति नष्ट करावैं।।
समता ताम्र रजत शुभकारी।
    स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी।।
जो यह शनि चरित्रा नित गावै।
    कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै।।
अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।
    करैं शत्राु के नशि बल ढीला।।
जो पंडित सुयोग्य बुलवाई।
    विधिवत शनि ग्रह शान्ति कराई।।
पीपल जल शनि-दिवस चढ़ावत।
    दीप दान दै बहु सुख पावत।।
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा।
    शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा।।
दोहा 
प्रतिमा श्री शनिदेव की, लोह धातु बनवाय।
प्रेम सहित पूजन करै, सकल कष्ट कटि जाय।।
चालीसा नित नेम यह, कहहिं सुनहिं धरि ध्यान।नि ग्रह सुखद ह्नै, पावहिं नर सम्मान।।