July 16, 2015

Guru Purnima

31 July 2015


Hindus attach supreme significance to religious teachers. Gurus (spiritual teachers) tend to be associated with God (bhagwan) and constantly looked at as a link between the person plus the Immortal. Just like the moon shines by showing the light of the sun (surya), and glorifies it, all followers can dazzle such as moon by gaining from their Gurus.

What exactly is Guru Purnima?

The complete moon day in the Hindu month of Ashad (July-August) is observed as the fortunate day of Guru Purnima, a day revered to the memory of the grand sage Maharshi Veda Vyasa.

Every Hindus are grateful to the historical saint who modified the 4 Vedas, wrote the eighteen Puranas, Mahabharata plus the Srimad Bhagavatam. Vyasa even taught Dattatreya, who's considered the Guru of Gurus.

Meaning of Guru Purnima

On this day, all religious applicants and followers worship Vyasa honoring his divine personage and all followers perform 'puja/sadhana' of their respected religious preceptor or 'Gurudevs'.

This present day is of deep implication to the farmers, for it heralds the establishing of the much-needed rains, since the advent of cool showers usher in fresh life in the fields. It's a great time to start your religious education. Conventionally, religious finders will make stronger their spiritual 'sadhana/puja/Mantra chanting' from this day.

The period 'Chaturmas' ("four months") starts from this day. During the past, wandering religious gurus and their followers used to cool down at a place to study and discussion in the Brahma Sutras composed by Vyasa, and have interaction them selves in Vedantic debate.

The Role of the (Guru) Religious teacher
Shivanand Das ji says: "Do you understand there are holy implication and the great significance of the Guru's role in the structuring of man? It wasn't with no the India of the past watchfully tended and kept alive the lamp of Guru-Tattva. For this reason it is not without cause that India, time after time, era after age, celebrates anew this olden concise explanation the Guru, loves it and pays reverence to it regularly, and thus re-affirms its perception and loyalty to it. For, the true Indian recognizes that the Guru is a only assurance of the individual to go beyond the bondage of sadness and death, and skill the Intelligence of the Reality."

गुरु पुर्णिमा के पावन पर्व पर क्या करे!!!

  • अपने गुरु को फोन द्वारा, इमेल द्वारा वाट्सअप् द्वारा संपर्क कर आशिर्वाद प्राप्त करे
  • आज के दिन अपने परिवार के साथ किसी मंदिर मे जाकर ईश्वर का दर्शन अवश्य करे.
  • आज के दिन अपने से बडे व्यक्ति का आशिर्वाद अवश्य प्राप्त करे.
  • आज के दिन गुरु के निर्देशानुसार मन्त्र जप करे या किसी देवी-देवता का मन्त्र जप अवश्य करे.
  • आज के दिन गुरु से गुरु दिक्षा या कोई अन्य दिक्षा अवश्य ले.
  • आज के दिन कोई भी साधना की शुरुवात करे या साधना से संबंधित दिक्षा अवश्य ले.
  • आज के दिन अध्यात्मिक सामग्री को अवश्य खरीदे.
  • आज के दिन किसी भी व्यक्ति का बुरा न सोचे, बल्कि अपने व अपने परिवार के खुशहाल भविष्य के बारे मे कामना करे.

What to do on Guru Purnima?

  • Contact your Guru via phone, email or whatsapp to get blessings from him.
  • Visit a nearby temple with your family for blessings from God.
  • Pay respect to your elders and get blessed.
  • Taking guidance from your Guru, chant particular mantra of any god/goddess and do the related required japa.
  • Gain Guru diksha or any other diksha from your respective Guru.
  • On this day, begin any type of Sadhana / puja & do take the necessary related diksha.
  • You must buy any Spiritual product on this auspicious day.
  • On this day, do not surround yourself with negative thoughts and hatred towards people, think well of everyone and especially pray for a healthy, wealthy and blessed future of you & your family.

July 10, 2015

कुंडलिनी व्याख्यान सेमिनार

अगर संयम और सही नियमों का पालन करते हुए लगातार ध्यान किया जाय तो धीरे धीरे कुंडलिनी जाग्रत होने लगती है और जब यह जाग्रत होती है तो व्यक्ति के स्वभाव मे परिवर्तन आ जाता है। वह दिव्य पुरुष बन जाता है। कुंडलिनी एक दिव्य शक्ति है जो सर्प की तरह साढ़े तीन फेरे लेकर शरीर के सबसे नीचे के चक्र मूलाधार में स्थित है। जब तक यह इस प्रकार नीचे रहती है तब तक व्यक्ति सांसारिक विषयों की ओर भागता रहता है। परन्तु जब यह जाग्रत होती है तो ऐसा प्रतीत होने लगता है कि कोई सर्पिलाकार तरंग है जो घूमती हुई ऊपर उठ रही है। यह बड़ा ही दिव्य अनुभव होता है। हमारे शरीर में सात चक्र होते हैं। कुंडलिनी का एक छोर मूलाधार चक्र पर है और दूसरा छोर रीढ़ की हड्डी के चारों तरफ लिपटा हुआ जब ऊपर की ओर गति करता है तो उसका उद्देश्य सातवें चक्र सहस्रार तक पहुंचना होता है, लेकिन यदि व्यक्ति संयम और ध्यान छोड़ देता है तो यह छोर गति करता हुआ किसी भी चक्र पर रुक सकता है। जब कुंडलिनी जाग्रत होने लगती है तो पहले व्यक्ति को उसके मूलाधार चक्र में स्पंदन का अनुभव होने लगता है। फिर वह कुंडलिनी तेजी से ऊपर उठती है और किसी एक चक्र पर जाकर रुकती है उसके बाद फिर ऊपर उठने लग जाती है। जिस चक्र पर जाकर वह रुकती है उसको व उससे नीचे के चक्रों में स्थित नकारात्मक उर्जा को हमेशा के लिए नष्ट कर चक्र को स्वस्थ और स्वच्छ कर देती है। कुंडलिनी के जाग्रत होने पर व्यक्ति सांसारिक विषय भोगों से दूर हो जाता है और उसका रूझान आध्यात्म व रहस्य की ओर हो जाता है। कुंडलिनी जागरण से शारीरिक और मानसिक ऊर्जा बढ़ जाती है और व्यक्ति खुद में शक्ति और सिद्धि का अनुभव करने लगता है।

कुंडलिनी जागरण के अनुभव

जब कुंडलिनी जाग्रत होने लगती है तो व्यक्ति को देवी-देवताओं के दर्शन होने लगती हैं। ब्रम्हनाद या ॐ या हूं हूं की गर्जना सुनाई देने लगती है। आंखों के सामने पहले काला, फिर पील और बाद में नीला रंग दिखाई देना लगता है। उसे अपना शरीर हवा के गुब्बारे की तरह हल्का लगने लगता है। वह गेंद की तरह एक ही स्थान पर अप-डाउन होने लगता है। उसके गर्दन का भाग ऊंचा उठने लगता है। उसे सिर में चोटी रखने के स्थान पर अर्थात सहस्रार चक्र पर चींटियां चलने जैसा अनुभव होता है और ऐसा लगता है कि मानो कुछ है जो ऊपर जाने की कोशिश कर रहा है। रीढ़ में कंपन होने लगता है। इस तरह के प्रारंभिक अनुभव होते हैं।

कुंडलिनी व्याख्यान सेमिनार

आचार्य श्री शिवानंद दास जी

Monday 27-07-2015, 5pm to 6.30pm at

SAMAJ KALYAN HALL, GROUND FLOOR, NEAR ZARI MARI GARDEN, DAHISAR EAST. MUMBAI-400068.

June 25, 2015

कमला (पद्मिनी) एकादशी

Sunday 28th June 2015

For wealth, prosperity and peace

अधिक मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है वह पद्मिनी (कमला) एकादशी कहलाती है। वैसे तो प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिक मास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है।

अधिक मास या मलमास को जोड़कर वर्ष में 26 एकादशी होती है। अधिक मास में दो एकादशी होती है जो पद्मिनी एकादशी (शुक्ल पक्ष) और परमा एकादशी (कृष्ण पक्ष) के नाम से जानी जाती है।

मलमास में अनेक पुण्यों को देने वाली एकादशी का नाम पद्मिनी है। इसका व्रत करने पर मनुष्य कीर्ति प्राप्त करके बैकुंठ को जाता है। जो मनुष्यों के लिए भी दुर्लभ है।

यह एकादशी करने के लिए दशमी के दिन व्रत का आरंभ करके काँसे के पात्र में जौं-चावल आदि का भोजन करें तथा नमक न खावें। भूमि पर सोए और ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें। एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में शौच आदि से निवृत्त होकर दन्तधावन करें और जल के बारह कुल्ले करके शुद्ध हो जाए।

सूर्य उदय होने के पूर्व उत्तम तीर्थ में स्नान करने जाए या पानी मे कुछ गंगा जल की बूंदे डालकर नहाये या इसमें तिल तथा कुशा व आँवले के चूर्ण से विधिपूर्वक स्नान करें। श्वेत वस्त्र धारण करके भगवान विष्णु के मंदिर जाकर पूजा-अर्चना करें।

पूर्वकाल में त्रेया युग में हैहय नामक राजा के वंश में कृतवीर्य नाम का राजा महिष्मती पुरी में राज्य करता था। उस राजा की एक हजार परम प्रिय स्त्रियाँ थीं, परंतु उनमें से किसी को भी पुत्र नहीं था, जो उनके राज्य भार को संभाल सकें। देवता, पितृ, सिद्ध तथा अनेक चिकित्सकों आदि से राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिए काफी प्रयत्न किए लेकिन सब असफल रहे। एक दिन राजा को वन में तपस्या के लिए जाते थे उनकी परम प्रिय रानी इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए राजा हरिश्चंद्र की पद्मिनी नाम वाली कन्या राजा के साथ वन जाने को तैयार हो गई। दोनों ने अपने अंग के आभूषणों का त्याग कर साधारण वस्त्र धारण कर गन्धमादन पर्वत पर गए।

राजा ने उस पर्वत पर दस हजार वर्ष तक तप किया परंतु फिर भी पुत्र प्राप्ति नहीं हुई। तब पतिव्रता रानी कमलनयनी पद्मिनी से अनुसूया ने कहा- बारह मास से अधिक महत्वपूर्ण मलमास होता है जो बत्तीस मास पश्चात आता है। उसमें द्वादशीयुक्त पद्मिनी शुक्ल पक्ष की एकादशी का जागरण समेत व्रत करने से तुम्हारी सारी मनोकामना पूर्ण होगी। इस व्रत करने से पुत्र देने वाले भगवान तुम पर प्रसन्न होकर तुम्हें शीघ्र ही पुत्र देंगे।

रानी पद्मिनी ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से कमला एकादशी का व्रत किया। वह एकादशी को निराहार रहकर रात्रि जागरण करती। इस व्रत से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। इसी के प्रभाव से पद्मिनी के घर कार्तिवीर्य उत्पन्न हुए। जो बलवान थे और उनके समान तीनों लोकों में कोई बलवान नहीं था। तीनों लोकों में भगवान के सिवा उनको जीतने का सामर्थ्य किसी में नहीं था।

यह एकादशी बहुत ही दुर्लभ मानी जाती है क्योंकि यह तभी आती है जब अधिक मास यानी मलमास लगता है। मलमास का महीना भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। इस महीने में श्री कृष्ण की नियमित पूजा करने से अन्य महीनों की अपेक्षा अधिक पुण्य लाभ मिलता है। जिनके लिए पूरे महीने विधिपूर्वक भगवान की पूजा करना कठिन है वह इस माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी एवं कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन व्रत रखकर कृष्ण की पूजा करें तो इससे भी कई गुणा पुण्य लाभ मिल जाता है।

शास्त्रों में कहा गया कि कमला पुरूषोत्तम एकादशी के दिन मसूर की दाल, चना, शहद, शाक एवं लहसुन, प्याज के सेवन से परहेज रखना चाहिए। इस दिन किसी और का दिया हुआ भोजन भी न करें। आज मीठा भोजन एवं हो सके तो केवल फल खाकर ही रहना चाहिए। जो व्यक्ति इन बातों का पालन करते हुए इस दिन भगवान की पूजा एवं अर्चना करता है उसे भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। व्रत के पुण्य से अनजाने में हुए कई पापों से मुक्ति मिलती है।

पुरूषोत्तम एकादशी के विषय में जो कथा मिलती है उसके अनुसार इस व्रत से सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है। एक अन्य कथा के अनुसार एक ब्राह्मण के पुत्र ने इस व्रत के नियमों का पालन करते हुए कमला पुरूषोत्तम एकादशी का व्रत रखा। व्रत के प्रभाव से माता लक्ष्मी उस पर प्रसन्न हुई और वह धनवान बन गया। व्रत के पुण्य से मृत्यु के पश्चात ब्राह्मण के इस पुत्र को भगवान श्री कृष्ण के गोलोक में स्थान प्राप्त हुआ।

इस व्रत में दान का विशेष महत्व है। इस दिन जरूरतमंदों को तिल, वस्त्र, धन एवं अपनी श्रद्धा के अनुसार फल एवं मिठाई दान करना चाहिए। जो लोग व्रत नहीं भी करते हों वह भी इन चीजों का दान करें तो उन पर भी ईश्वर की कृपा बनी रहती है।

इस दिन व्रत, पूजा, साधना करने से पुत्र, सामर्थ्य, प्रसिद्धी प्राप्त होती है। आज के दिन पुत्र तथा धन-सम्पदा प्राप्त करने लिये पूजा साधना अवश्य करना चाहिये।

June 7, 2015

Kavach to Mind

Most individuals the world over undergo from psychological weakness, a while or of their lives. The fatigue of mind, give rise to a lot of different psychological together with bodily conditions. The mind and physique each function, properly under their optimum ranges and feeling of lethargy and being overwhelmed overcomes the sufferer.

The Talisman given on this put up is an Indian Yantra, which is believed to own the potential to beat the signs, described above and in the identical time strengthen the mind.

This Yantra is free from any sort of infusion course of and therefore could be ready and put into sensible use anytime. It might both be ready on a Bhojpatra, utilizing Ashtagandha paste or on White Paper, written with Red Ink.

An Indian Talisman to strengthen the mind

Then as soon as ready it may be used as a Talisman, by conserving it within the pocket or tied around the neck by inserting it in a fabric Tabeez or Metallic Locket.


Raksha Kavach Samagri to Strengthen Mind

Gauri Shankar Rudraksha sadhna muhurt

  • Day- Holi, Diwali, Ravi/Guru pushya nakshatra or any Saturday, Amavasya.
  • Time- after 10pm
  • Direction- south

See Sadhana Rules

May 16, 2015

Nirjala Ekadashi/Pandav Ekadashi/Bhimsaini Ekadashi


29th May 2015 is Nirjala Ekadasi

Nirjala Ekadashi is a most necessary and vital Ekadashis. As per Hindu calendar Ekadashi falls on the eleventh day of each lunar fortnight. So, 24 Ekadasis within the year. Ekadashi Vrat is considered extremely pious and is assumed to be one of the methods to realize Moksha.

Nirjala Ekadashi falls on the Shukla paksha within the month of Jyestha. Additionally it is referred to as "Jyeshtha Shukla Ekadashi" or "Bhimsaini Ekadashi". It's considered as one of the vital rewarding fast.Lord Krishna.

Significance of Nirjala Ekadashi

  • The greatness of Nirjala Ekadasi was defined by Sage Vyasa.
  • It is the same as occurring pilgrimage.
  • It gives advantage of all 24 Ekadashi.
  • It washes away all sin.
  • Grants happiness, prosperity, longevity and moksha (salvation).
  • This Ekadasi occurs earlier than monsoon season and due to this fact it is usually helps in cleaning the body.
  • The best way to Observe Nirjala Ekadashi Vrat

Nirjala means with out water. Therefore, fast is observed with out water and food. It's thought of as probably the most strict and therefore, most sacred of all Ekadashis. This fast is extraordinarily troublesome to comply with because it falls within the hot Indian summer. The 24 hours lengthy fast begins from sunrise on Nirjala Ekadashi to sunrise the following day. A person fast and provide pooja to Lord Vishnu on this day.

The fast begins with Sandhyavandanam - a prayer. This prayer is carried out within the evening earlier than Nirjala Ekadashi, i.e. on tenth lunar day. After prayer devotee takes just one meal, with out rice (as rice consuming is prohibited). The strict fast steady all through Ekadashi. It will get over on subsequent morning. Devotees offer prayer, tulsi, fruits, and sweets to Lord Vishnu after which finish their fast.

Rituals and celebrations of Nirjala Ekadasi

  • Provide Pooja to Lord Vishnu and search his grace.
  • Bath the idol of Lord Vishnu with Panchamrit.
  • Wash with clear water after which wearing new clothes.
  • Provide flowers, incense, water, lamps and a hand fan.
  • In night, pooja Vishnu with Durva grass.
  • Go to close by Vishnu temple and observe Jagran at night.
  • Chant bhajans, Vishnu Sahasranama and different slokas devoted to Lord Vishnu
  • Donate garments, meals grains, umbrellas, hand-fans, pitchers crammed with water, gold etc.

Legend of Nirjala Ekadashi Vrat

Bhimsen - the second Pandava brother and large eater wished to maintain Ekadashi Vrat. All his brothers, spouse Draupadi and mom Kunti observed Vrat on 24 Ekadasis all year long and request him to do the same. However he was unable to carry out the ritual because of insufferable starvation pangs. Bhima, was upset as a result of his weak determination. He was additionally sacred of dishonouring to Lord Vishnu. So, when Maharishi Vyasa visited them Bhima requested him to discover a solution. Sage Vyasa suggested him to watch single Nirjala Ekadasi fasting. This fast would compensate for not observing all Ekadashi fasting within the year. Bhima carried out the fast with an ease but on the morning of very subsequent day he grew to become unconscious. Then he supplied Ganga water with Tulsi to finish up his day fast. On account of this legend Nirjala Ekadashi is usually generally known as Bhimseni Ekadashi, Bhima Ekadashi or Pandava Ekadashi.

Puja/Retual on Nirjala Ekadashi

You can perform Puja rituals on this day.....

Kalsarpa Puja

Mangalik Puja

Pitra Dosha Nivaran Puja

Chandal Dosha Puja

Narayan Puja / Sadhana

May 15, 2015

Santaan Gopal strot for Male child


॥ श्री सन्तानगोपाल स्तोत्रम् ॥

सन्तान गोपाल मूल मन्त्र

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।

सन्तान गोपाल स्तोत्रम्

श्रीशं कमलपत्राक्षं देवकीनन्दनं हरिम् ।

सुतसंप्राप्तये कृष्णं नमामि मधुसूदनम् ॥१॥

नमाम्यहं वासुदेवं सुतसंप्राप्तये हरिम् ।

यशोदाङ्कगतं बालं गोपालं नन्दनन्दनम्॥२॥

अस्माकं पुत्रलाभाय गोविन्दं मुनिवन्दितम् ।

नमाम्यहं वासुदेवं देवकीनन्दनं सदा ॥३॥

गोपालं डिम्भकं वन्दे कमलापतिमच्युतम् ।

पुत्रसंप्राप्तये कृष्णं नमामि यदुपुङ्गवम् ॥४॥

पुत्रकामेष्टिफलदं कञ्जाक्षं कमलापतिम् ।

देवकीनन्दनं वन्दे सुतसम्प्राप्तये मम ॥५॥

पद्मापते पद्मनेत्रे पद्मनाभ जनार्दन ।

देहि मे तनयं श्रीश वासुदेव जगत्पते ॥६॥

यशोदाङ्कगतं बालं गोविन्दं मुनिवन्दितम् ।

अस्माकं पुत्र लाभाय नमामि श्रीशमच्युतम् ॥७॥

श्रीपते देवदेवेश दीनार्तिर्हरणाच्युत ।

गोविन्द मे सुतं देहि नमामि त्वां जनार्दन ॥८॥

भक्तकामद गोविन्द भक्तं रक्ष शुभप्रद ।

देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ॥९॥

रुक्मिणीनाथ सर्वेश देहि मे तनयं सदा ।

भक्तमन्दार पद्माक्ष त्वामहं शरणं गतः ॥१०॥

देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥११॥

वासुदेव जगद्वन्द्य श्रीपते पुरुषोत्तम ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥१२॥

कञ्जाक्ष कमलानाथ परकारुणिकोत्तम ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥१३॥

लक्ष्मीपते पद्मनाभ मुकुन्द मुनिवन्दित ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥१४॥

कार्यकारणरूपाय वासुदेवाय ते सदा ।

नमामि पुत्रलाभार्थ सुखदाय बुधाय ते ॥१५॥

राजीवनेत्र श्रीराम रावणारे हरे कवे ।

तुभ्यं नमामि देवेश तनयं देहि मे हरे ॥१६॥

अस्माकं पुत्रलाभाय भजामि त्वां जगत्पते ।

देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव रमापते ॥१७॥

श्रीमानिनीमानचोर गोपीवस्त्रापहारक ।

देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ॥१८॥

अस्माकं पुत्रसंप्राप्तिं कुरुष्व यदुनन्दन ।

रमापते वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ॥१९॥

वासुदेव सुतं देहि तनयं देहि माधव ।

पुत्रं मे देहि श्रीकृष्ण वत्सं देहि महाप्रभो ॥२०॥

डिम्भकं देहि श्रीकृष्ण आत्मजं देहि राघव ।

भक्तमन्दार मे देहि तनयं नन्दनन्दन ॥२१॥

नन्दनं देहि मे कृष्ण वासुदेव जगत्पते ।

कमलनाथ गोविन्द मुकुन्द मुनिवन्दित ॥२२॥

अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम ।

सुतं देहि श्रियं देहि श्रियं पुत्रं प्रदेहि मे ॥२३॥

यशोदास्तन्यपानज्ञं पिबन्तं यदुनन्दनं ।

वन्देऽहं पुत्रलाभार्थं कपिलाक्षं हरिं सदा ॥२४॥

नन्दनन्दन देवेश नन्दनं देहि मे प्रभो ।

रमापते वासुदेव श्रियं पुत्रं जगत्पते ॥२५॥

पुत्रं श्रियं श्रियं पुत्रं पुत्रं मे देहि माधव ।

अस्माकं दीनवाक्यस्य अवधारय श्रीपते ॥२६॥

गोपाल डिम्भ गोविन्द वासुदेव रमापते ।

अस्माकं डिम्भकं देहि श्रियं देहि जगत्पते ॥२७॥

मद्वाञ्छितफलं देहि देवकीनन्दनाच्युत ।

मम पुत्रार्थितं धन्यं कुरुष्व यदुनन्दन ॥२८॥

याचेऽहं त्वां श्रियं पुत्रं देहि मे पुत्रसंपदम्।

भक्तचिन्तामणे राम कल्पवृक्ष महाप्रभो ॥२९॥

आत्मजं नन्दनं पुत्रं कुमारं डिम्भकं सुतम् ।

अर्भकं तनयं देहि सदा मे रघुनन्दन ॥३०॥

वन्दे सन्तानगोपालं माधवं भक्तकामदम् ।

अस्माकं पुत्रसंप्राप्त्यै सदा गोविन्दमच्युतम् ॥३१॥

ॐकारयुक्तं गोपालं श्रीयुक्तं यदुनन्दनम् ।

क्लींयुक्तं देवकीपुत्रं नमामि यदुनायकम् ॥३२॥

वासुदेव मुकुन्देश गोविन्द माधवाच्युत ।

देहि मे तनयं कृष्ण रमानाथ महाप्रभो ॥३३॥

राजीवनेत्र गोविन्द कपिलाक्ष हरे प्रभो ।

समस्तकाम्यवरद देहि मे तनयं सदा ॥३४॥

अब्जपद्मनिभं पद्मवृन्दरूप जगत्पते ।

देहि मे वरसत्पुत्रं रमानायक माधव ॥३५॥

नन्दपाल धरापाल गोविन्द यदुनन्दन ।

देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ॥३६॥

दासमन्दार गोविन्द मुकुन्द माधवाच्युत ।

गोपाल पुण्डरीकाक्ष देहि मे तनयं श्रियम् ॥३७॥

यदुनायक पद्मेश नन्दगोपवधूसुत ।

देहि मे तनयं कृष्ण श्रीधर प्राणनायक ॥३८॥

अस्माकं वाञ्छितं देहि देहि पुत्रं रमापते ।

भगवन् कृष्ण सर्वेश वासुदेव जगत्पते ॥३९॥

रमाहृदयसंभारसत्यभामामनः प्रिय ।

देहि मे तनयं कृष्ण रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ॥४०॥

चन्द्रसूर्याक्ष गोविन्द पुण्डरीकाक्ष माधव ।

अस्माकं भाग्यसत्पुत्रं देहि देव जगत्पते ॥४१॥

कारुण्यरूप पद्माक्ष पद्मनाभसमर्चित ।

देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दनन्दन ॥४२॥

देवकीसुत श्रीनाथ वासुदेव जगत्पते ।

समस्तकामफलद देहि मे तनयं सदा ॥४३॥

भक्तमन्दार गम्भीर शङ्कराच्युत माधव ।

देहि मे तनयं गोपबालवत्सल श्रीपते ॥४४॥

श्रीपते वासुदेवेश देवकीप्रियनन्दन ।

भक्तमन्दार मे देहि तनयं जगतां प्रभो ॥४५॥

जगन्नाथ रमानाथ भूमिनाथ दयानिधे ।

वासुदेवेश सर्वेश देहि मे तनयं प्रभो ॥४६॥

श्रीनाथ कमलपत्राक्ष वासुदेव जगत्पते ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥४७॥

दासमन्दार गोविन्द भक्तचिन्तामणे प्रभो ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥४८॥

गोविन्द पुण्डरीकाक्ष रमानाथ महाप्रभो ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥४९॥

श्रीनाथ कमलपत्राक्ष गोविन्द मधुसूदन ।

मत्पुत्रफलसिद्ध्यर्थं भजामि त्वां जनार्दन ॥५०॥

स्तन्यं पिबन्तं जननीमुखांबुजं विलोक्य मन्दस्मितमुज्ज्वलाङ्गम् ।

स्पृशन्तमन्यस्तनमङ्गुलीभिर्वन्दे यशोदाङ्कगतं मुकुन्दम् ॥५१॥

याचेऽहं पुत्रसन्तानं भवन्तं पद्मलोचन ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥५२॥

अस्माकं पुत्रसम्पत्तेश्चिन्तयामि जगत्पते ।

शीघ्रं मे देहि दातव्यं भवता मुनिवन्दित ॥५३॥

वासुदेव जगन्नाथ श्रीपते पुरुषोत्तम ।

कुरु मां पुत्रदत्तं च कृष्ण देवेन्द्रपूजित ॥५४॥

कुरु मां पुत्रदत्तं च यशोदाप्रियनन्दनम् ।

मह्यं च पुत्रसन्तानं दातव्यंभवता हरे ॥५५॥

वासुदेव जगन्नाथ गोविन्द देवकीसुत ।

देहि मे तनयं राम कौशल्याप्रियनन्दन ॥५६॥

पद्मपत्राक्ष गोविन्द विष्णो वामन माधव ।

देहि मे तनयं सीताप्राणनायक राघव ॥५७॥

कञ्जाक्ष कृष्ण देवेन्द्रमण्डित मुनिवन्दित ।

लक्ष्मणाग्रज श्रीराम देहि मे तनयं सदा ॥५८॥

देहि मे तनयं राम दशरथप्रियनन्दन ।

सीतानायक कञ्जाक्ष मुचुकुन्दवरप्रद ॥५९॥

विभीषणस्य या लङ्का प्रदत्ता भवता पुरा ।

अस्माकं तत्प्रकारेण तनयं देहि माधव ॥६०॥

भवदीयपदांभोजे चिन्तयामि निरन्तरम् ।

देहि मे तनयं सीताप्राणवल्लभ राघव ॥६१॥

राम मत्काम्यवरद पुत्रोत्पत्तिफलप्रद ।

देहि मे तनयं श्रीश कमलासनवन्दित ॥६२॥

राम राघव सीतेश लक्ष्मणानुज देहि मे ।

भाग्यवत्पुत्रसन्तानं दशरथप्रियनन्दन ।

देहि मे तनयं राम कृष्ण गोपाल माधव ॥६४॥

कृष्ण माधव गोविन्द वामनाच्युत शङ्कर ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥६५॥

गोपबाल महाधन्य गोविन्दाच्युत माधव ।

देहि मे तनयं कृष्ण वासुदेव जगत्पते ॥६६॥

दिशतु दिशतु पुत्रं देवकीनन्दनोऽयं

दिशतु दिशतु शीघ्रं भाग्यवत्पुत्रलाभम् ।

दिशतु दिशतु शीघ्रं श्रीशो राघवो रामचन्द्रो

दिशतु दिशतु पुत्रं वंश विस्तारहेतोः ॥६७॥

दीयतां वासुदेवेन तनयोमत्प्रियः सुतः ।

कुमारो नन्दनः सीतानायकेन सदा मम ॥६८॥

राम राघव गोविन्द देवकीसुत माधव ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥६९॥

वंशविस्तारकं पुत्रं देहि मे मधुसूदन ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ॥७०॥

ममाभीष्टसुतं देहि कंसारे माधवाच्युत ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ॥७१॥

चन्द्रार्ककल्पपर्यन्तं तनयं देहि माधव ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ॥७२॥

विद्यावन्तं बुद्धिमन्तं श्रीमन्तं तनयं सदा ।

देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दन प्रभो ॥७३॥

नमामि त्वां पद्मनेत्र सुतलाभाय कामदम् ।

मुकुन्दं पुण्डरीकाक्षं गोविन्दं मधुसूदनम् ॥७४॥

भगवन् कृष्ण गोविन्द सर्वकामफलप्रद ।

देहि मे तनयं स्वामिंस्त्वामहं शरणं गतः ॥७५॥

स्वामिंस्त्वं भगवन् राम कृष्न माधव कामद ।

देहि मे तनयं नित्यं त्वामहं शरणं गतः ॥७६॥

तनयं देहिओ गोविन्द कञ्जाक्ष कमलापते ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ॥७७॥

पद्मापते पद्मनेत्र प्रद्युम्न जनक प्रभो ।

सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ॥७८॥

शङ्खचक्रगदाखड्गशार्ङ्गपाणे रमापते ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥७९॥

नारायण रमानाथ राजीवपत्रलोचन ।

सुतं मे देहि देवेश पद्मपद्मानुवन्दित ॥८०॥

राम राघव गोविन्द देवकीवरनन्दन ।

रुक्मिणीनाथ सर्वेश नारदादिसुरार्चित ॥८१॥

देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥८२॥

मुनिवन्दित गोविन्द रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥८३॥

गोपिकार्जितपङ्केजमरन्दासक्तमानस ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥८४॥

रमाहृदयपङ्केजलोल माधव कामद ।

ममाभीष्टसुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ॥८५॥

वासुदेव रमानाथ दासानां मङ्गलप्रद ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥८६॥

कल्याणप्रद गोविन्द मुरारे मुनिवन्दित ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥८७॥

पुत्रप्रद मुकुन्देश रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥८८॥

पुण्डरीकाक्ष गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥८९॥

दयानिधे वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥९०॥

पुत्रसम्पत्प्रदातारं गोविन्दं देवपूजितम् ।

वन्दामहे सदा कृष्णं पुत्र लाभ प्रदायिनम् ॥९१॥

कारुण्यनिधये गोपीवल्लभाय मुरारये ।

नमस्ते पुत्रलाभाय देहि मे तनयं विभो ॥९२॥

नमस्तस्मै रमेशाय रुमिणीवल्लभाय ते ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥९३॥

नमस्ते वासुदेवाय नित्यश्रीकामुकाय च ।

पुत्रदाय च सर्पेन्द्रशायिने रङ्गशायिने ॥९४॥

रङ्गशायिन् रमानाथ मङ्गलप्रद माधव ।

देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥९५॥

दासस्य मे सुतं देहि दीनमन्दार राघव ।

सुतं देहि सुतं देहि पुत्रं देहि रमापते ॥९६॥

यशोदातनयाभीष्टपुत्रदानरतः सदा ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥९७॥

मदिष्टदेव गोविन्द वासुदेव जनार्दन ।

देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥९८॥

नीतिमान् धनवान् पुत्रो विद्यावांश्च प्रजापते ।

भगवंस्त्वत्कृपायाश्च वासुदेवेन्द्रपूजित ॥९९॥

यःपठेत् पुत्रशतकं सोऽपि सत्पुत्रवान् भवेत ।

श्रीवासुदेवकथितं स्तोत्ररत्नं सुखाय च ॥१००॥

जपकाले पठेन्नित्यं पुत्रलाभं धनं श्रियम् ।

ऐश्वर्यं राजसम्मानं सद्यो याति न संशयः ॥१०१॥

गुणवान तथा मेघावी संतान की प्राप्ति व संतान सुख हेतु बाल-गोपाल श्री कृष्ण का संतान गोपाल स्तोत्र का नियमित पाठ करने से आश्चर्य जनक परिणाम प्राप्त होता है।

May 15, 2015

Power of Shiva Linga

Shiva Linga: Shiva Linga is a holy image of Lord Shiva that's thought-about sacred by the devotees of Lord Shiva. The phrase, ‘Lingum’ in Sanskrit means, ‘symbol’. Shiva Lingum, due to this fact means symbol of Lord Shiva and is due to this fact considered most sacred by Shaivaites. Siva Linga have been worshipped in Hinduism since ages. Pooja of Shiva Linga is regarded sacred and superior Shiva Mahapurana. It's as a result of the form makes pooja easy whereas maintaining the facts that Bhagawan doesn't have any definite form.

Construction of Shiva Linga

Most prevalent icon of Shiva and nearly present in all Shiva temples (mandir), Shiva Linga is often a rounded, elliptical, an-iconic picture that's usually set on a circular base or peetham. Based on a number of students the Peetham represents Parashakti, the manifesting energy of Bhagawan.

Shiva Lingas are often made from stone that will either be carved or naturally present - svayambhu, like formed by a swift-flowing river. Shiva Lingas can also be made from metallic, treasured gems, crystal, wooden, earth or transitory materials like ice. A number of spiritual students say that transitory Shiva Linga could also be made from 12 totally different materials like sand, rice, cooked meals, river clay, cow dung, butter, rudraksha seeds, ashes, sandalwood, darbha grass, a flower garland or molasses.

Numerous Interpretation of Shiva Linga

Apart from relating to Shiva Linga because the image and type of Lord Shiva, spiritual students have given numerous interpretations of Shiva Linga. Here's a transient description of a number of of the favored theories and interpretations associated to Shiva Linga and its origin:

Pooja of your Phallus

Primarily based on a number of spiritual students, pooja of Shiva Linga in effect means pooja of the reproduction function. For, they are saying that the other which means of the Sanskrit phrase ‘Linga’ is gender usually and phallus (the male reproductive organ) in particular. They imagine that the bottom of the Lingam corresponds to the Yoni which imply vagina or the female reproductive organ. Correspondence of Linga and Yoni in the Shiva Linga is due to this fact interpreted because the illustration of the method of copulation. Students additional opine that the Kalash (container of water) that's suspended over the Shiva Linga from which water drips over the Linga additionally correspond to the concept of intercourse.

Connecting the origin of Shiva Linga to the early Indus Valley civilization, scholars opine that tribes of your Indus Valley took to the togetherness of Lingam and Yoni in a Shiva Linga as the purpose of power, creation and enlightenment.

Interpretation in Tantra shakti

Primarily based on Tantra shakti, Lingam is often a logo of Shiva’s phallus in religious form. They are saying, the lingam incorporates the soul-seed inside which lies the essence of the entire cosmos. The lingam arises from the bottom (Yoni) which represents Parvati based on a number of or Vishnu, Brahma in feminine and neuter kind based on others.

Interpretation in Puranas

Puranas, particularly the Vamana Purana, Shiva Purana, Linga Purana, Skanda Purana, Matsya Purana and Visva-Sara-Prakasha attribute the origin of Shiva Linga to the curse of sages resulting in the separation of and set up of the phallus of Lord Shiva on earth. A number of also consult with the endlessness of the lingam to be linked to the egos of Lord Vishnu and Lord Brahma.

Interpretation of Shiva Linga as Summary Image of Bhagawan

A number of spiritual students of the Hindu scriptures say that Linga is merely an summary image of the Bhagawan. They point in the direction of a number of legends in Hinduism the place a sundry rock or perhaps a pile of sand have been utilized by as a Lingam or the image of Shiva. Citing a selected occasion they are saying, Arjuna once fashioned a linga of clay when worshipping Shiva. Students of Puranas, thus argue that additionally a lot should not be made from the same old form of the Lingam. Students say that the interpretation of Shiva Linga as an summary type of Bhagawan can also be consonant with philosophies that hold that Bhagawan could also be conceptualized and worshipped in any convenient form. The shape itself is irrelevant, because the divine energy that it represents is all that matters. Students thus say that Sivalinga symbolize the formless Nirguna Brahman or the formless Supreme Being.

May 8, 2015

धन प्राप्ति के लिये महालक्ष्मी स्त्रोत

देवराज इन्द्र द्वारा रचित इस महालक्ष्मी जी के स्तोत्र का पाठ करने से सुख धन-धान्य की बृद्धि होती है।

नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।

शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्षि्म नमोस्तु ते॥1॥

नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयङ्करि।

सर्वपापहरे देवि महालक्षि्म नमोस्तु ते॥2॥

सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि।

सर्वदु:खहरे देवि महालक्षि्म नमोस्तु ते॥3॥

सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्ति मुक्ति प्रदायिनि।

मन्त्रपूते सदा देवि महालक्षि्म नमोस्तु ते॥4॥

आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्ति महेश्वरि।

योगजे योगसम्भूते महालक्षि्म नमोस्तु ते॥5॥

स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्ति महोदरे।

महापापहरे देवि महालक्षि्म नमोस्तु ते॥6॥

पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि।

परमेशि जगन्मातर्महालक्षि्म नमोस्तु ते॥7॥

श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते।

जगत्सि्थते जगन्मातर्महालक्षि्म नमोस्तु ते॥8॥

महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं य: पठेद्भक्ति मान्नर:।

सर्वसिद्धिमवापनेति राज्यं प्रापनेति सर्वदा॥9॥

एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम्।

द्विकालं य: पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वित:॥10॥

त्रिकालं य: पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम्।

महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा॥11॥

हिंदी अर्थ :- इन्द्र बोले- श्रीपीठपर स्थित और देवताओं से पूजित होने वाली हे महामाये महालक्ष्मी। तुम्हें नमस्कार है।

हाथ में शङ्ख, चक्र और गदा धारण करने वाली हे महालक्ष्मी! तुम्हें प्रणाम है॥1॥

गरुड पर विराजमान हकरो कोलासुर को भय देने वाली और समस्त पापों को हरने वाली हे भगवति महालक्ष्मी! तुम्हें प्रणाम है॥2॥

सब कुछ जानने वाली, सबको वर देने वाली, समस्त दुष्टों को भय देने वाली और सबके दु:खों को दूर करने वाली, हे देवि महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है॥3॥

सिद्धि, बुद्धि, भोग और मोक्ष देने वाली हे मन्त्रपूत भगवती महालक्ष्मी! तुम्हें सदा प्रणाम है॥4॥

हे देवी ! हे आदि-अन्त-रहित आदिशक्ते ! हे महेश्वरी! हे योग से प्रकट हुई भगवति महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है॥5॥

हे देवी ! तुम स्थूल, सूक्ष्म एवं महारौद्ररूपिणी हो, महाशक्ति हो, महोदरा हो और बडे-बडे पापों का नाश करने वाली हो। हे देवि महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है॥6॥

हे कमल के आसन पर विराजमान परब्रह्मस्वरूपिणी देवि! हे परमेश्वरी! हे जगदम्बा! हे महालक्ष्मी! तुम्हें मेरा प्रणाम है॥7॥

हे देवी तुम श्वेत वस्त्र धारण करने वाली और नाना प्रकार के आभूषणों से विभूषिता हो। सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त एवं अखिल लोक को जन्म देने वाली हो। हे महालक्ष्मी! तुम्हें मेरा प्रणाम है॥8॥

जो मनुष्य भक्ति युक्त होकर इस महालक्ष्म्यष्टक स्तोत्र का सदा पाठ करता है, वह सारी सिद्धियों और राज्यवैभव को प्राप्त कर सकता है॥9॥

जो प्रतिदिन एक समय पाठ करता है, उसके बडे-बडे पापों का नाश हो जाता है। जो दो समय पाठ करता है, वह धन-धान्य से सम्पन्न होता है॥10॥

जो प्रतिदिन तीन काल पाठ करता है उसके महान् शत्रुओं का भी नाश हो जाता है और उसके ऊपर कल्याणकारिणी वरदायिनी महालक्ष्मी सदा ही प्रसन्न रहती हैं॥11॥

May 7, 2015

धन-संपदा प्राप्त करने लिये श्री सूक्त साधना

भाग्योदय हेतु श्रीमहा-लक्ष्मी की तीन मास की सरल, व्यय रहित साधना है। यह साधना कभी भी ब्राह्म मुहूर्त्त पर प्रारम्भ की जा सकती है। ‘दीपावली’ जैसे महा्पर्व पर यदि यह प्रारम्भ की जाए, तो अति उत्तम।

‘साधना’ हेतु सर्व-प्रथम स्नान आदि के बाद यथा-शक्ति (कम-से-कम १०८ बार) “ॐ ह्रीं सूर्याय नमः” मन्त्र का जप करें।

फिर ‘पूजा-स्थान’ में कुल-देवताओं का पूजन कर भगवती श्रीमहा-लक्ष्मी यंत्र का पूजन करे। पूजन में ‘कुंकुम’ महत्त्वपूर्ण है, इसे अवश्य चढ़ाए।

पूजन के पश्चात् माँ की कृपा-प्राप्ति हेतु मन-ही-मन ‘संकल्प करे। फिर विश्व-प्रसिद्ध“श्री-सूक्त” का ११ बार पाठ करे। इस प्रकार ‘तीन मास’ उपासना करे। बाद में, नित्य एक बार पाठ करे। विशेष पर्वो पर भगवती का लक्ष्मी रमणा आरती से सांय-काल ‘कुंकुमार्चन’ करे। अनुष्ठान काल में ही अद्भुत परिणाम दिखाई देते हैं। अनुष्ठान पूरा होने पर “भाग्योदय” होता है।

।।श्री सूक्त।।

ॐ हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्त्रजाम्।

चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।।

तां म आवह जात-वेदो, लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।

यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम्।।

अश्वपूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रमोदिनीम्।

श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।।

कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं।

पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम्।

तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि।।

आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः।

तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।

उपैतु मां दैव-सखः, कीर्तिश्च मणिना सह।

प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिं वृद्धिं ददातु मे।।

क्षुत्-पिपासाऽमला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम्।

अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्।।

गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम्।

ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम्।।

मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि।

पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः।।

कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भ्रम-कर्दम।

श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम्।।

आपः सृजन्तु स्निग्धानि, चिक्लीत वस मे गृहे।

निच-देवी मातरं श्रियं वासय मे कुले।।

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं, सुवर्णां हेम-मालिनीम्।

सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह।।

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं, पिंगलां पद्म-मालिनीम्।

चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह।।

तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।

यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरूषानहम्।।

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा, जुहुयादाज्यमन्वहम्।

श्रियः पंच-दशर्चं च, श्री-कामः सततं जपेत्।।

श्री सुक्त साधना मुहुर्त

  • समय- सुबह ४बजे के बाद
  • दिशा- पूर्व
  • जप- २१ बार रोज
  • सिद्ध श्री सूक्त यन्त्र

श्री सुक्त साधना सामग्री

  • लक्ष्मी माला
  • लक्ष्मी यन्त्र

May 7, 2015

लक्ष्मी रमणा की आरती

पारिवारिक सुख तथा धन-स्म्पत्ति के लिये नियमित रुप या हर गुरुवार को आरती करे तो माता लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।

जय लक्ष्मी रमणा श्री जय लक्ष्मी रमणा,

शरणागत जय शरण गोवर्धन धारणा । टेक

जै जै युमना तट निकटित प्रगटित बटुवेषा ।

अटपट गोपी कुंज तट पट पर नटवर वेषा ॥ जय०

जय जय जय रघुवीर कंसारे ।

पति कृपा वारे संसारे ॥ जय०

जय जय गोपी पलक बन्धो ।

जय माता तुम कृष्ण कृपा सिन्धो ॥ जय०

जै जै भक्तजन प्रतिपालक चिरंजीवो विष्णो ।

मामुद्धर दिनो घरणीघर विष्णो ॥ जय०

जै जै कृष्ण निजपत रस सागर में ।

कुरु करुणा कुरु करुणा दास सखासिख में ॥ जय०