शिवानंद दास जी के मार्ग दर्शन मे

2 DAYS KUNDALINI DHYAN SHIVIR

AT CHANDIGAD

PARASHURAM BHAVAN, SECTOR-37. CHANDIGAD. PUNJAB.

Learn practical kundalini Dhyan by "Acharya Shivanand Das ji"


जीवन मे जिसने भी अपने चक्रो को समझ लिया तो समझो सफलता की कुंजी उसके हाथ मे आ गई. इस शिविर मे इन चक्रो कोे चैतन्य करने की विधि पैक्टिकल रूप मे दीक्षा के साथ सिखाई जाती है. इस शिविर के द्वारा जहा आप अपनी आर्थिक समस्या तथा मानसिक समस्या मे लाभ प्राप्त कर सकते है, वही अध्यात्मिक क्षेत्र मे भी सफलता प्राप्त कर सकते है.

आचार्य श्री शिवानंद दास जी , जो कि पिछले ४० वर्षो से पूरे भारत मे अध्यात्मिक विषय पर यानी ध्यान- प्राणायाम-्कूंडलिनी- अस्ट्रोलोजी- पामेस्ट्री- न्युम्रोलोजी- प्राण विज्ञान- औरा रीडिंग- एस्ट्रल ट्रेवल्स- पैरा नोर्मल- हिप्नोटिझम तथा मंत्र साधना पर शिक्षा प्रदान कर रहे है.
इस शिविर मे भाग लेकर अपने जीवन को एक नई दिशा दीजिये!
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Mon.-Sun. 11:00 – 21:00
mantravidya@yahoo.com
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Tara Pratyangira kavach strot, online Tara Pratyangira strot

।। तारा प्रत्य़ंगिरा कवचम् स्त्रोत।।

इस तारा-प्रत्यंगिरा कवच पहनकर ११ बार यह तारा-प्रत्यंगिरा कवच स्त्रोत का पाठ कर विशेष कार्य के लिये जाये तो कार्य मे सफलता मिलती है तथा शत्रु अपना प्रभाव नही डाल पाता।

।। ॐ प्रत्यंगिराये नमः ।।

ईश्वर उवाच –

ॐ तारायाः स्तम्भिनी देवी मोहिनी क्षोभिनी तथा ।

हस्तिनी भ्रामिनी रौद्री संहारण्यापि तारिणी ।

शक्तयोहष्टौ क्रमादेता शत्रुपक्षे नियोजितः ।

धारिता साधकेन्द्रेण सर्वशत्रु निवारिणी ।

ॐ स्तम्भिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् स्तम्भय स्तम्भय ।

ॐ क्षोभिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् क्षोभय क्षोभय ।

ॐ मोहिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् मोहय मोहय ।

ॐ जृम्भिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् जृम्भय जृम्भय ।

ॐ भ्रामिनी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् भ्रामय भ्रामय ।

ॐ रौद्री स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् सन्तापय सन्तापय ।

ॐ संहारिणी स्त्रें स्त्रें मम शत्रुन् संहारय संहारय ।

ॐ तारिणी स्त्रें स्त्रें सर्व्वपद्भ्यः सर्व्वभूतेभ्यः सर्व्वत्र

रक्ष रक्ष मां स्वाहा ।।

य इमां धारयेत् विध्यां त्रिसन्ध्यं वापि यः पठेत् ।

स दुःखं दूरतस्त्यक्त्वा ह्यन्याच्छत्रुन् न संशयः ।

रणे राजकुले दुर्गे महाभये विपत्तिषु ।

विध्या प्रत्य़ञ्गिरा ह्येषा सर्व्वतो रक्षयेन्नरं ।।

अनया विध्या रक्षां कृत्वा यस्तु पठेत् सुधी ।

मन्त्राक्षरमपि ध्यायन् चिन्तयेत् नीलसरस्वतीं ।

अचिरे नैव तस्यासन् करस्था सर्व्वसिद्ध्यः

ॐ ह्रीं उग्रतारायै नीलसरस्वत्यै नमः ।।

इमं स्तवं धीयानो नित्यं धारयेन्नरः ।

सर्व्वतः सुखमाप्नोति सर्व्वत्रजयमाप्नुयात् ।

नक्कापि भयमाप्नोति सर्व्वत्रसुखमाप्नुयात् ।।

इति रूद्रयामले श्रीमदुग्रताराया प्रत्य़ञ्गिरा कवचम् समाप्तम् ।।